कत्लेआम

सुलोचना परमार ‘उत्तरांचली देहरादून( उत्तराखंड) ******************************************************* आज भावनाओं का भी देखो ऐसे कत्लेआम होता है। घर में मारकर बीबी को वो, बाहर खूब जोर से रोता है। ऐसे कत्लेआम… बेटी को भी ना छोड़े ये, ऐसा पिता भी होता है। लगे धब्बे जो दामन पे, सरेआम वो धोता है। ऐसे कत्ले आम… भाई का भाई … Read more

आत्मजा

विजयलक्ष्मी विभा  इलाहाबाद(उत्तरप्रदेश) ********************************************************* आत्मजा खंडकाव्य से अध्याय-९ विधि को सुखद लगी यह जोडी, उसने आँखें चार करायीं यह कैसा संयोग अजब था, नजरें भी तलवार बनायीं। लगीं काटने वे सपनों को, देखा करती थी जो प्रति पल हमला करतीं आदर्शों पर, जिनसे रहता था मन उज्जवल। कभी कनखियों से वह देखे, कभी देखती उसे … Read more

भ्रूण हत्या बड़ा अपराध

विजय कुमार मणिकपुर(बिहार) ****************************************************************** भ्रूण हत्या है बड़ा अपराध इसे रोकें हम और आप, लड़का-लड़की में अंतर नहीं फिर क्यों होते है इतने अपराध। काजल नहीं सुंदरता का लो कालिख तुम पोत, ऐसा रूप सहेज लो जो हो सुंदरता का प्रतीक। माता तो माता होती है क्यों अपराधी के रूप, ऐसी गलती ना करो जो … Read more

अधीन

डाॅ.आशा सिंह सिकरवार अहमदाबाद (गुजरात )  **************************************************************** अधीन बहुत गहरे, मानदंड पितृसत्तात्मक मान-प्रतिष्ठा के नीचे दबी कुचली किरकिरी-सी, नहीं रत्तीभर जगह समा जाए वह पीठ वजन भर, खड्डे में उड़ेल भर लौटी प्राण-प्रतिष्ठा जगत में उपहास वह रोई, खुद ही देखी पराधीनता के भंवर में उठती धीरे-धीरे चिंगारी, किस दिशा अधीर अजीब छटपटाहट, पीड़ा से … Read more

‘मत’ की राजनीति

राजबाला शर्मा ‘दीप’ अजमेर(राजस्थान) ******************************************************************************************** वायदों की फेहरिस्त बनाकर, जनता को नेता लुभा रहे हैं। झूठे-झूठे दिखा के सपने, सबको मूर्ख बना रहे हैं। अच्छे दिन तो कभी न आये, ना ही अच्छे दिन आयेगें। भरमा अपने वाग्जाल से, वाह! वाह! अपनी करा रहे हैं। बेरोजगारों को वेतन भत्ता, खातों में जमा होगा पैसा। नौकरी … Read more

जंगल के हम हैं फूल

डॉ.जयभारती चन्द्राकर भारती गरियाबंद (छत्तीसगढ़) *************************************************************************** जंगल के हम हैं फूल’ सदा हँसते और लहलहाते हैं ना हमें खाद की जरूरत, ना हमें ही नित पानी चाहिए बिना किसी देखभाल के, दिखते हैं कितने सुन्दर। जंगल के हम हैं फूल… ना किसी का संरक्षण, ना ही किसी का दुलार फिर भी हम जी लेते हैं, अपनी … Read more

मजदूर की आवाज

ओमप्रकाश अत्रि सीतापुर(उत्तरप्रदेश) ********************************************************************************* बदलते समय में बदलते रहेंगे, जीवन के दुर्गम मार्गों पर चलते रहेंगे, पूंजी की समरसता से, लड़ते रहेंगे। पिस नहीं पाएंगे, धन के पाटों के बीच, सह नहीं पाएंगे तुम्हारे पैरों की ठोकर, अब अपनी आवाज से तुम्हारी सोई हुई चेतना को, जगाते रहेंगे। होते विकास बदलते समाज में, कम मजदूरी … Read more

तुम किस्मत आजमाना,मैं संघर्ष करुँगा

दीपेश पालीवाल ‘गूगल’  उदयपुर (राजस्थान) ************************************************** लाख आए चाहे तूफान कोई जीवन में अब मैं नहीं रुकूँगा, चुनौतियाँ हजार मिलें चाहें मुझे मैं सब स्वीकार करूँगा। तुम किस्मत आजमाना,मैं संघर्ष करूँगा…॥ तुम चाहे जेक-चेक हजार लगाना, या चाहे किसी मंत्री से बात करवाना। अबके मैं बिल्कुल नहीं रुकूंगा, तुम किस्मत आजमाना,मैं संघर्ष करूँगा…॥ डर के … Read more

पोरस

नताशा गिरी  ‘शिखा’  मुंबई(महाराष्ट्र) ********************************************************************* जो जीता वही सिकन्दर इस मिथ्या को कब तक तुम गाओगे, पोरस की विजयगीत को इतिहास के पन्नों में कब तक यूँ छिपाओगे। सिन्धु नदी और झेलम ने फिर पोरस को पुकारा है, उन इतिहासकारों की चाटुकारिकता को देखो कितना धिक्कारा है। मुद्राराक्षस के पन्नों को कभी तुम टटोल लो, … Read more

मतलबी राग

शिवम द्विवेदी ‘शिवाय’  इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************************************************************** किसका गीत सुनाऊँ,सब मतलबी राग हैं, भीतर से दगाबाज़ बाहर फिर भी सजाये साज हैं। आदमी संभलता तब,जब वक्त की लगती ठोकर है, जो करता बातें सच्ची,सच्ची राह बताता ये दुनिया उसे समझती जोकर है। ये ज़माना किसी का नहीं,न ही इस पे हक़ किसी का, यहाँ कुछ भी … Read more