निभाने चला हूँ मैं
कैलाश झा ‘किंकर’ खगड़िया (बिहार) ************************************************************************************ पत्थर पे आज दूब जमाने चला हूँ मैं, मुमकिन यहाँ है कुछ भी तो गाने चला हूँ मैं। जो चीज दूर थी वो निकट आ गयी है अब, इक्कीसवीं सदी से निभाने चला हूँ मैं। तालीम की न फिक्र जहाँ है समाज को, उस गाँव में खुशी से पढ़ाने … Read more