तपती धरती

डॉ.शैल चन्द्रा धमतरी(छत्तीसगढ़) ******************************************************************** तपती धरती,जल रहा आसमान, घटता जल,सब हैं हैरान। लुप्त होती हरियाली, नहीं दिखती प्रकृति की लाली। नीम-पीपल की छाँव तले, अब न कोई झूला झूले। बाग-बगीचे में न कोई मिले, पेड़-पौधों को सब भूले। शीतल न होती अब सिंदूरी साँझ, धरती हो रही अब बाँझ। सूरज अब डराने लगा है, मन … Read more

खिड़की खुली रहीं

डाॅ.आशा सिंह सिकरवार अहमदाबाद (गुजरात )  **************************************************************** खिड़की और दरवाजे, झाड़ते-पोंछते पता ही नहीं लगा, कि कब खुल गयीं खिड़कियाँ कब खुल गए दरवाजे, मेरे लिए। जंगलों की तरफ, रात-रात भागती कुम्हारिन कभी पिशाचिन बनती तो कभी बच्चों को, उठा ले जाने वाली डायन अंधेरे में टार्च और लाठी, नंगी आँखें सिर्फ एक औरत की … Read more

दर्पण की व्यथा

अवधेश कुमार ‘अवध’ मेघालय ******************************************************************** जो जैसा मेरे दर आता, ठीक हूबहू खुद को पाता। फिर मुझ पर आरोप लगाता, पक्षपात कह गाल बजाता॥ मैं हँसता वह जल-भुन जाता, ज्यों दाई से गर्भ छुपाता। अदल-बदल मुखड़े लगवाता, रंग-रसायन नित पुतवाता॥ शिशु-सा नंगा रूप दिखाता, इठलाता एवं शर्माता। झूठ बोलने को उकसाता, सच्चाई से नज़र चुराता॥ … Read more

मेरा हमसफ़र

कपिल कुमार जैन  भीलवाड़ा(राजस्थान) ***************************************************************** बारिश में न रात जल्दी आ जाया करती है, आफिस से घर लौटते वक़्त अँधेरा हो जाता है। सड़क पर चारों तरफ भीड़… ट्रैफिक का शोर…, तकरीबन पन्द्रह मिनट लगते हैं रास्ता तय करने में… कोई है ! जो मेरा हमसफ़र बनता है इस बीच। कल देखा था आसमां पर, … Read more

कोरा कागज़

डॉ.धारा बल्लभ पाण्डेय’आलोक’ अल्मोड़ा(उत्तराखंड) ****************************************************************************** इस धरती पर जब भी, कोई आता है। उसका मन कोरा कागज सा होता है। कोरे कागज पर, हर वर्ण व शब्द बिंदु मौजूद होते हैं। हर भाषा के, अवयव बिंदु मौजूद होते हैं। हर चित्र व आकृति के दृश्य बिंदु विद्यमान होते हैं। हर रंग व छठा की, ग्रहण … Read more

शपथ

अर्चना पाठक निरंतर अम्बिकापुर(छत्तीसगढ़) ***************************************************************************** सदा सच बोलूँ,ये शपथ लेता हूँ। झूठ की पोल खोलूँ,ये शपथ लेता हूँ। भ्रष्ट कदम डगमगाने लगे अगर कभी तो- उन कदमों में शूल चुभाऊँ,ये शपथ लेता हूँ। निष्ठापूर्वक कार्य करूँ,ये शपथ लेता हूँ। मुश्किल राह से ना डरुं,ये शपथ लेता हूँ। फिर भी असफल हो जाऊँँ अगर कभी तो- पुन: … Read more

रोजी-रोटी-मकान

आशुतोष कुमार झा’आशुतोष’  पटना(बिहार) **************************************************************************** खुद पे ऐतबार का, चंद सवालों का झमेला यहाँ, वक्त-वक्त का मेला रे। रोजी-रोटी-मकान, का यहाँ झमेला रे। भूख की जात नहीं, रोजी-रोटी की बात नहीं नंगे पांव चलते-चलते, छाले का झमेला रे। तन ढका नहीं, मन पढ़ा नहीं कह दिया नंगा रे, बात-बात का झमेला रे। सर्दी-गर्मी-बरसात, छत की … Read more

गर्मी में…

शंकरलाल जांगिड़ ‘शंकर दादाजी’ रावतसर(राजस्थान)  *********************************************************************************- झुलस रहे हैं पौधे सारे झुलस रही हैं सभी लताएँ, सारे तन को जला रही हैं दक्षिण की ये गर्म हवाएँ, जल से अपनी प्यास बुझा ले… आ राही थोड़ा सुस्ता लेl जेष्ठ महीना तपती धूप सूख गये हैं सारे कूप, बालू रेत में चला ना जाए कैसे अपनी … Read more

उत्कर्ष

डॉ. आशा गुप्ता ‘श्रेया’ जमशेदपुर (झारखण्ड) ******************************************* आत्मदृष्टि पाना ही दु:ख हरण का मार्ग है, करम ताे जीवन फिर क्याें पीड़ा की आग है ? क्यों सोचता है मानव हर पल बस हर्ष हाे, जीवन में आते-जाते कितने ही संघर्ष हैं..। सदा चलना लय ताल पे, यही ताे उत्कर्ष है॥ परिचय- डॉ.आशा गुप्ता का लेखन में … Read more

कभी नहीं जान पाओगे

मोनिका गौड़’मोनिका’ बीकानेर (राजस्थान ) ************************************************** मैंने जो जाना लिखा जो पहचाना लिखा, जो ना जाना,ना पहचाना वो महसूस कर लिखाl जानने,लिखने और पहचानने के बीच फिसलते रहे कुछ अनुभव, जो सिर्फ गालों पर उन्हें सूखे अश्कों में लिखाl और अपने ही हाथों से मिटा मुस्कान में लपेट कर पेश कर दिया, चाय के साथ … Read more