स्वीकारो या उपेक्षित करो
सविता सिंह दास सवि तेजपुर(असम) ************************************************************************* ये जो संकोच पलता है ना मन में तुम्हारे, मेरे अस्तित्व को स्वीकारने या नकारने के लिए, इसे तुम थोड़ा-सी ढील दो… देखो मैं कोई पतंग-सी उड़ती हूँ, या तुम्हारे अहं के खूंटे से बंधी रहती हूँ, इतना ही तो आकलन है मेरी इस काया काl आत्मा तक कहाँ पहुँच … Read more