घर-परिवार:ज़रूरत बदले हुए नज़रिए की

शशि दीपक कपूरमुंबई (महाराष्ट्र)************************************* घर-परिवार स्पर्धा विशेष…… ‘ज़िंदगी मेरे घर आना,आना ज़िंदगी,मेरे घर का सीधा-सा इतना पता है,मेरे घर के आगे मुहब्बत लिखा है,न दस्तक ज़रूरी,ना आवाज देना,मैं साँसों की रफ़्तार से जान लूँगी,हवाओं की खुशबू से पहचान लूँगी।…’कहने का तात्पर्य है-‘जो सुख छज्जू के चौबारे, ओ बल्ख न बुखारे’ इस उक्ति का अर्थ है … Read more

घर-परिवार एवं हमारा दायित्व- एक चिंतन

नमिता घोषबिलासपुर (छत्तीसगढ़)**************************************** घर-परिवार स्पर्धा विशेष…… बचपन जीवन की मुख्य अवस्था है। इसे बहुत ही जतन और स्नेह की आवश्यकता होती है,लेकिन वर्तमान समय में बचपन की उम्र घटने लगी है। बचपन से ही बे-मेल विचारों की बाढ़ आने लगी है, अब बचपन से ही बच्चे असमय ही परिपक्व होने लगे हैं। बचपन पर यह … Read more

अपना-अपना घोंसला

डॉ.अर्चना मिश्रा शुक्लाकानपुर (उत्तरप्रदेश)*************************************** घर-परिवार स्पर्धा विशेष…… गाय भी रंभाती हुई अपने बच्चों पर ममता और प्यार लुटाने को खूँटे तक पहुँचती है,चिड़िया भी घोंसला बनाती है और बच्चों के लिए खाना-पानी जुटाती है। जंगल का राजा शेर भी विश्राम हेतु म्यांद बनाता है,न जाने कितने पशु-पक्षी अपने लिए खोह और बिल बनाते हैं यानी … Read more

मौन से न्याय सम्भव नहीं

इंदु भूषण बाली ‘परवाज़ मनावरी’ज्यौड़ियां(जम्मू कश्मीर) ********************************************** मौन से न्याय कदापि सम्भव नहीं है,जबकि यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि मौन रहकर स्वयं द्वारा स्वयं से अन्याय करना है और गीता के उपदेश के अनुसार अन्याय करना और सहना हर दृष्टिकोण से महापाप होता है।भले ही मौन से मन की शक्ति बढ़ती है,और सर्वविदित है … Read more

साहित्य के शलाका पुरुष डॉ. प्रभाकर माचवे

डॉ. दयानंद तिवारीमुम्बई (महाराष्ट्र)************************************ परम्परागत कविता से आगे नए विषय,नई भाषा,नए भावबोध और अभिव्यक्तियों के साथ ही प्रयोगवाद के बाद हिंदी कविता में ‘नयी कविता’ की शुरुआत हुई। इसमें नए मूल्यों और नए शिल्प-विधान का अन्वेषण किया गया। प्रभाकर माचवे इसी ‘नयी कविता’ की धारा के ही कवि रहे हैं।अपने प्रारंभिक वर्षों के दौरान डॉ. … Read more

तप एवं संयम की अक्षय मुस्कान का पर्व

ललित गर्गदिल्ली ************************************** अक्षय तृतीया(१४ मई)विशेष….. अक्षय तृतीया महापर्व का न केवल सनातन परम्परा में,बल्कि जैन परम्परा में विशेष महत्व है। इसका लौकिक और लोकोत्तर-दोनों ही दृष्टियों में महत्व है। इस त्यौहार के साथ-साथ एक अबूझा मांगलिक एवं शुभ दिन भी है,जब बिना किसी मुहूर्त के विवाह एवं मांगलिक कार्य किए जा सकते हैं। रास्ते … Read more

मानवीय संवेदनाओं पर भारी स्वार्थ

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’बेंगलुरु (कर्नाटक) *************************************** आज समाज,शहर,नगर,प्रदेश,देश या यूँ कहें सम्पूर्ण मानव जगत ‘कोरोना’ महामारी की विकराल मौत के तांडव में फँसा त्राहि माम्-त्राहि माम् शिव कर रहा है। श्वांसों की डोर प्राणवायु (ऑक्सीजन) के मकड़जाल में फँसी कराह रही है। एक ओर प्राणवायु की किल्लत तो दूसरी ओर संवेदनाविहीन शैतानी प्राणवायु चोरी,सौदेबाजी, जमाखो़री,गबन … Read more

‘कोरोना’ पर काबू संभव,लेकिन…

डॉ.वेदप्रताप वैदिकगुड़गांव (दिल्ली) ******************************* यदि विश्व स्वास्थ्य संगठन टीकों पर से पेटेंट (अधिकार,स्वामित्व) का बंधन उठा लेता है तो १००-२०० करोड़ टीकों का इंतजाम करना कठिन नहीं है। अमेरिकी, यूरोपीय,रुसी और चीनी कंपनियां चाहें तो भारत को करोड़ों टीके कुछ ही दिनों में भिजवा सकती है। खुद भारतीय कंपनियां भी इस लायक हैं कि वे हमारी … Read more

‘कोरोना’ क्या-क्या छीनोगे!

डॉ.अरविन्द जैनभोपाल(मध्यप्रदेश)**************************************** इतिहास में पढ़ा था कि युद्धों में-महामारियों में बहुतों की मौत हुई थी और रात में कभी भी दाह संस्कार नहीं होते थे,पर इस ‘कोरोना’ ने सब बदल दिया है। जो संक्रमित हैं,या थे या होंगे की अलग-अलग कहानियां हैं। यह समय दुर्दिन के हैं। इस समय उदासी,निराशा,हताशा,दुःख,शोक की लहर हर घर,समाज,मुहल्ले,नगर,महानगर, देश … Read more

माँ जैसा प्यार किसी भी रिश्ते में नहीं

नमिता घोषबिलासपुर (छत्तीसगढ़)**************************************** ‘विश्व मातृ दिवस’ सारे विश्व में मनाया जाता है। यूँ तो जिंदगी का कोई एक दिन या तारीख माँ को विशेष सम्मानार्थ के लिए ‘मातृ दिवस’ के रूप में मनाने का कोई भी औचित्य नहीं है। कारण,सृष्टि के आरंभ से माँ है-धरती,स्वयं माँ है प्रकृति,स्वयं माँ ही है जीवन का आधार। प्रतिदिन … Read more