मेरे गाँव की हवा
नताशा गिरी ‘शिखा’ मुंबई(महाराष्ट्र) ********************************************************************* हाले दिल गाँव का क्या सुनाऊँ आपको, पहले जन्नत,अब खण्डहर-सा लग रहा है। जिसे देख आँखें सुकून पातीं थी हवाएं, जो अब मन-ही-मन खटक रही है। सूनी वादियों मे जहाँ गीत गातीं थीं हवाएं, तनहाइयों में जहाँ गुनगुनाती थीं हवाएं। वन बाग़ उपवन को जहाँ महकाती थीं हवाएं, शहरों की … Read more